मुझे खाने में तड़का लगते देखना बहुत पसंद है। उसकी छन्न की आवाज़ और फिर भीतर तक समाती एक तेज़ ख़ुशबू। मुझे आखों में काजल लगाना भी पसंद है। मुझे काजल लगी आखों से गिरते आसूं भी उतने ही ख़ूबसूरत लगते हैं, जितना काजल भरी एक जोड़ी आखों का खिलखिलाना।
मुझे ख़ुद को आईने में देखना अच्छा लगता है। तब भी जब चेहरे में, अपने कपड़ों में या त्वचा पर, देखने जैसा कुछ नहीं होता। बस मन करता है, आईने के सामने बैठकर अपना अधूरापन देखूं।
रोते वक्त अपना सिर पकड़ लेने की मेरी आदत है। मेट्रो में बैठे हुए किसी बच्चे को खेलते, किसी लड़की को मुस्कुराते या औरतों को बातें करते देख भी मैं रोने लगती थी। जब रोना आए तो यह किसे ख़याल रहता है कि वह कहाँ बैठा है! चाहे मेट्रो हो या कोई कॉन्सर्ट। मैं भी झट से आंसू वैसे ही पोंछ लेती थी, जैसे तारा।
हाँ, तारा। लंबे बाल, काजल से सजी ख़ूबसूरत आखें, उल्टे पल्ले की साड़ी, उसका रेस्टॉरेंट, दो बच्चे और बेहिसाब अधूरापन।
तारा कम बोलती है। शायद इसलिए कि उसकी बड़ी-बड़ी आंखें बहुत कुछ बोल देती हैं। अमर जब पूछता है -'अपने हसबेंड के साथ भी आती थीं?"
'हाँ, रोज़', तारा इतना कहती है और उसकी आँखें हल्का नम हो जाती हैं। किसी किरदार की आँखों में झांकना ज़रूरी होता है। आखें शरीर का वो हिस्सा हैं, जो सबसे ज़्यादा बातें करती हैं। ज़ुबान को तो झूठ बोलने की आदत होती है। जैसे तारा ने अमर से झूठ कहा था- 'मैं आपको देखकर नहीं चल रही।'
मर्दों के मामले में मुझे बस 'भाई' शब्द समझ आता है। मुझे कोई कहे कि 'मर्द' शब्द पर कुछ लिखो तो मुझसे कुछ लिखा न जाएगा। मैं बस दुनिया का सुना-सुनाया कुछ झूठ लिख दूंगी। जैसे, सारे मर्द बुरे नहीं होते, सारे मर्द कठोर नहीं होते, मर्द को भी दर्द होता है। बिल्कुल घिसी-पिटी बातें। मर्द होना बस इतना भर तो नहीं होता होगा न? क्योंकि अमर की आँखें भी तो तारा की आँखों सी गहरी थीं। तारा हर बार फोन काट देती थी और अमर हाथ में रिसीवर लिए खड़ा रहता, अपनी खिड़की के शीशे में ख़ुद को देखता। इस वक्त अमर उतना ही अधूरा होता, जितनी तारा।
तारा अमर की तरह इतनी बेबाक नहीं कि कह सके- 'लेकिन मुझे आपको देखना बहुत पसंद है।'
या सीधे तारा के रेस्टॉरेंट आ जाए उससे मिलने, गजरे के साथ। या हाथ पकड़कर कहे -'मैं आपके साथ चलना चाहता हूँ। आपके साथ जीना चाहता हूँ। आपकी फ़िक्र करना चाहता हूँ। आपसे प्यार करना चाहता हूँ।"
तारा को जैसे एक वक्त के बाद पता चल जाता है कि खाना अच्छा बनेगा या ख़राब, वैसे ही उसे यह भी पता रहता है कि कब फोन काट देना है। कितना बोलना है। क्या कहना है, किस बात से इंकार कर देना है। कब टूटा दिल लिए लौट आना है और कब अमर की हथेलियों में जब्त अपनी हथेलियों को छुड़ा लेना है। तारा अपने खाने की तरह पर्फ़ेक्ट है। किसी फिल्म के किरदारों की भावनाएं जब दर्शकों की भावनाओं के साथ ब्लेंड होती हैं, तब कुछ ऐसी ही धुकधुकी महसूस होती है जैसी 'वंस अगेन' देखते हुए मुझे होती रही।
फ़िल्म कम बोलती, कहती ज़्यादा है। बैग्राउंड स्कोर और शहर मुंबई की आवाज़, बस यही दो आवाज़ें सबसे ज़्यादा सुनाई देती हैं। बाक़ी हर किरदार अपने हिस्से के डायलॉग्स काट देता हो, ऐसा महसूस होता है। कभी-कभी जवाब गाड़ी की स्टेयरिंग वील थामे रहने भर में दे दिया जा सकता है, कभी स्वीमिंग पूल का पानी छूते रहने भर से। ऐसा कैसे होता है कि ये बोलते भी नहीं और लगता भी नहीं कि और बोलना था? मुझे हमेशा लगा, नहीं बस इतना ही बोलना था। और बोलते तो कहानी यूं न कही जा सकती थी।
फ़िल्म में वह ठहराव है जो तारा और अमर की ठहर गई ज़िन्दगियों में नहीं।
मुझे ख़ुद को आईने में देखना अच्छा लगता है। तब भी जब चेहरे में, अपने कपड़ों में या त्वचा पर, देखने जैसा कुछ नहीं होता। बस मन करता है, आईने के सामने बैठकर अपना अधूरापन देखूं।
रोते वक्त अपना सिर पकड़ लेने की मेरी आदत है। मेट्रो में बैठे हुए किसी बच्चे को खेलते, किसी लड़की को मुस्कुराते या औरतों को बातें करते देख भी मैं रोने लगती थी। जब रोना आए तो यह किसे ख़याल रहता है कि वह कहाँ बैठा है! चाहे मेट्रो हो या कोई कॉन्सर्ट। मैं भी झट से आंसू वैसे ही पोंछ लेती थी, जैसे तारा।
हाँ, तारा। लंबे बाल, काजल से सजी ख़ूबसूरत आखें, उल्टे पल्ले की साड़ी, उसका रेस्टॉरेंट, दो बच्चे और बेहिसाब अधूरापन।
तारा कम बोलती है। शायद इसलिए कि उसकी बड़ी-बड़ी आंखें बहुत कुछ बोल देती हैं। अमर जब पूछता है -'अपने हसबेंड के साथ भी आती थीं?"
'हाँ, रोज़', तारा इतना कहती है और उसकी आँखें हल्का नम हो जाती हैं। किसी किरदार की आँखों में झांकना ज़रूरी होता है। आखें शरीर का वो हिस्सा हैं, जो सबसे ज़्यादा बातें करती हैं। ज़ुबान को तो झूठ बोलने की आदत होती है। जैसे तारा ने अमर से झूठ कहा था- 'मैं आपको देखकर नहीं चल रही।'
मर्दों के मामले में मुझे बस 'भाई' शब्द समझ आता है। मुझे कोई कहे कि 'मर्द' शब्द पर कुछ लिखो तो मुझसे कुछ लिखा न जाएगा। मैं बस दुनिया का सुना-सुनाया कुछ झूठ लिख दूंगी। जैसे, सारे मर्द बुरे नहीं होते, सारे मर्द कठोर नहीं होते, मर्द को भी दर्द होता है। बिल्कुल घिसी-पिटी बातें। मर्द होना बस इतना भर तो नहीं होता होगा न? क्योंकि अमर की आँखें भी तो तारा की आँखों सी गहरी थीं। तारा हर बार फोन काट देती थी और अमर हाथ में रिसीवर लिए खड़ा रहता, अपनी खिड़की के शीशे में ख़ुद को देखता। इस वक्त अमर उतना ही अधूरा होता, जितनी तारा।
तारा अमर की तरह इतनी बेबाक नहीं कि कह सके- 'लेकिन मुझे आपको देखना बहुत पसंद है।'
या सीधे तारा के रेस्टॉरेंट आ जाए उससे मिलने, गजरे के साथ। या हाथ पकड़कर कहे -'मैं आपके साथ चलना चाहता हूँ। आपके साथ जीना चाहता हूँ। आपकी फ़िक्र करना चाहता हूँ। आपसे प्यार करना चाहता हूँ।"
तारा को जैसे एक वक्त के बाद पता चल जाता है कि खाना अच्छा बनेगा या ख़राब, वैसे ही उसे यह भी पता रहता है कि कब फोन काट देना है। कितना बोलना है। क्या कहना है, किस बात से इंकार कर देना है। कब टूटा दिल लिए लौट आना है और कब अमर की हथेलियों में जब्त अपनी हथेलियों को छुड़ा लेना है। तारा अपने खाने की तरह पर्फ़ेक्ट है। किसी फिल्म के किरदारों की भावनाएं जब दर्शकों की भावनाओं के साथ ब्लेंड होती हैं, तब कुछ ऐसी ही धुकधुकी महसूस होती है जैसी 'वंस अगेन' देखते हुए मुझे होती रही।
फ़िल्म कम बोलती, कहती ज़्यादा है। बैग्राउंड स्कोर और शहर मुंबई की आवाज़, बस यही दो आवाज़ें सबसे ज़्यादा सुनाई देती हैं। बाक़ी हर किरदार अपने हिस्से के डायलॉग्स काट देता हो, ऐसा महसूस होता है। कभी-कभी जवाब गाड़ी की स्टेयरिंग वील थामे रहने भर में दे दिया जा सकता है, कभी स्वीमिंग पूल का पानी छूते रहने भर से। ऐसा कैसे होता है कि ये बोलते भी नहीं और लगता भी नहीं कि और बोलना था? मुझे हमेशा लगा, नहीं बस इतना ही बोलना था। और बोलते तो कहानी यूं न कही जा सकती थी।
फ़िल्म में वह ठहराव है जो तारा और अमर की ठहर गई ज़िन्दगियों में नहीं।
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