Skip to main content

Posts

Showing posts from November, 2018

'स्पर्श' के बहाने

नसीरुद्दीन शाह की 1980 की एक फिल्म है, जिसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। और इसकी निर्देशक सई परांजपे के हिस्से आया सर्वश्रेष्ठ पटकथा का पुरस्कार। फिल्म का नाम है, स्पर्श। एक नेत्रहीन व्यक्ति की कहानी। जो कि दिल्ली के अंधविद्यालय का प्रिंसिपल है। फिल्म की शुरुआत बेहद प्यारी है। बरामदे में एक बच्चा ब्रेल लिपि में लिखी कोई किताब ज़ोर-ज़ोर से पढ़ रहा है, और अनिरुद्ध(नसीरुद्दीन शाह) वहाँ से गुजरते हुए ठहर जाता है। वह बच्चे का नाम पूछता है। बच्चा कहता है, “राम प्यारे सक्सेना, तीसरी कक्षा।” बचपन, स्कूल, अपना भोलापन, सब याद आ जाता है आपको यह सुनते ही। यह कहानी है एक विकलांग व्यक्ति के ख़ुद को और अपने स्कूल के बच्चों को दुनिया की नज़र में बराबरी दिलाने की। वह अपने बच्चों को ‘बेचारा’ कहा जाना पसंद नहीं करता। वह अपने बच्चों के लिए ब्रेल लिपि में ट्रांसलेट हुई हर नयी किताब ख़रीद लाता है। बच्चे संगीत, खेल, नाटक अथवा और भी सह पाठ्यक्रम गतिविधियों में शामिल हो सकें, अपना मनोरंजन और ज्ञानार्जन दोनों कर सकें, यह सुनिश्चित करता है। इस बीच वह कुछ नहीं चाहता तो वह है लोगों की ...

Nolite Te Bastardes Carborundorum

मैं कभी टैटू बनवा पाई, तो यही गुदवाउंगी। यह फ़्रेज़ मार्गरेट ऐटवूड के उपन्यास 'द हैंडमेड्स टेल' से है। हालांकि ऐसे लैटिन दिखने वाले इस फ़्रेज़ का कुछ भी मतलब नहीं, पर किताब में इसका मतलब है। इसका मतलब है - Don't let the bastards grind you down. इस फ़्रेज़ का मतलब भी किताब में काफी देर बाद पता चलता है और इसे जानने की उत्सुकता भी अजब थी। 1985 में लिखी गई यह किताब जॉर्ज अॉर्वेल की किताब 'ऐनिमल फ़ार्म' की ही तरह एक काल्पनिक दुनिया की कहानी कहती है। यह दुनिया औरतों के लिए नरक है। बल्कि यह साशकों के अलावा सबके लिए नरक है। पढ़ते हुए इतनी इंट्रीगिंग लगी यह किताब कि लगा ही नहीं कि यह कोई मेरी कल्पना के परे की दुनिया है, जिसका वास्तविकता से कोई वास्ता नहीं। बल्कि कहानी की नायिका 'अॉफ़रेड (Offred)' की बातें, उसका डर, उसकी इच्छाएं हर औरत के क़रीब लगी। और जिस व्यवस्था की चर्चा है इसमें, वह व्यवस्था भी वास्तविकता से कोसों दूर की चीज़ न लगी। द रिपब्लिक अॉफ़ गिलिअड में डिवॉरसेज़ इललीगल है। इसलिए दूसरी शादियों को नल कर दिया गया है। अॉफ़रेड, जिसका असली नाम उपन्यास के अंत तक पता नहीं चलत...

Once Again (Movie)

मुझे खाने में तड़का लगते देखना बहुत पसंद है। उसकी छन्न की आवाज़ और फिर भीतर तक समाती एक तेज़ ख़ुशबू। मुझे आखों में काजल लगाना भी पसंद है। मुझे काजल लगी आखों से गिरते आसूं भी उतने ही ख़ूबसूरत लगते हैं, जितना काजल भरी एक जोड़ी आखों का खिलखिलाना। मुझे ख़ुद को आईने में देखना अच्छा लगता है। तब भी जब चेहरे में, अपने कपड़ों में या त्वचा पर, देखने जैसा कुछ नहीं होता। बस मन करता है, आईने के सामने बैठकर अपना अधूरापन देखूं। रोते वक्त अपना सिर पकड़ लेने की मेरी आदत है। मेट्रो में बैठे हुए किसी बच्चे को खेलते, किसी लड़की को मुस्कुराते या औरतों को बातें करते देख  भी मैं रोने लगती थी। जब रोना आए तो यह किसे ख़याल रहता है कि वह कहाँ बैठा है! चाहे मेट्रो हो या कोई कॉन्सर्ट। मैं भी झट से आंसू वैसे ही पोंछ लेती थी, जैसे तारा। हाँ, तारा। लंबे बाल, काजल से सजी ख़ूबसूरत आखें, उल्टे पल्ले की साड़ी, उसका रेस्टॉरेंट, दो बच्चे और बेहिसाब अधूरापन। तारा कम बोलती है। शायद इसलिए कि उसकी बड़ी-बड़ी आंखें बहुत कुछ बोल देती हैं। अमर जब पूछता है -'अपने हसबेंड के साथ भी आती थीं?" 'हाँ, रोज़', तारा इतना कहती है और ...