नसीरुद्दीन शाह की 1980 की एक फिल्म है, जिसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। और इसकी निर्देशक सई परांजपे के हिस्से आया सर्वश्रेष्ठ पटकथा का पुरस्कार। फिल्म का नाम है, स्पर्श। एक नेत्रहीन व्यक्ति की कहानी। जो कि दिल्ली के अंधविद्यालय का प्रिंसिपल है। फिल्म की शुरुआत बेहद प्यारी है। बरामदे में एक बच्चा ब्रेल लिपि में लिखी कोई किताब ज़ोर-ज़ोर से पढ़ रहा है, और अनिरुद्ध(नसीरुद्दीन शाह) वहाँ से गुजरते हुए ठहर जाता है। वह बच्चे का नाम पूछता है। बच्चा कहता है, “राम प्यारे सक्सेना, तीसरी कक्षा।” बचपन, स्कूल, अपना भोलापन, सब याद आ जाता है आपको यह सुनते ही। यह कहानी है एक विकलांग व्यक्ति के ख़ुद को और अपने स्कूल के बच्चों को दुनिया की नज़र में बराबरी दिलाने की। वह अपने बच्चों को ‘बेचारा’ कहा जाना पसंद नहीं करता। वह अपने बच्चों के लिए ब्रेल लिपि में ट्रांसलेट हुई हर नयी किताब ख़रीद लाता है। बच्चे संगीत, खेल, नाटक अथवा और भी सह पाठ्यक्रम गतिविधियों में शामिल हो सकें, अपना मनोरंजन और ज्ञानार्जन दोनों कर सकें, यह सुनिश्चित करता है। इस बीच वह कुछ नहीं चाहता तो वह है लोगों की ...